
रायगढ़ में टेंडर पर सवाल: नगर निगम बनाम किरोड़ीमल नगर पंचायत—नियमों में बड़ा फर्क, उठे पक्षपात के आरोप
रायगढ़। जिले में मेनपावर सप्लाई से जुड़े टेंडरों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रायगढ़ नगर निगम और किरोड़ीमल नगर पंचायत द्वारा जारी निविदाओं में कई ऐसे विरोधाभास सामने आए हैं, जिन्होंने पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
निविदाओं में प्रमुख अंतर
- टेंडर वैधता अवधि: नगर निगम रायगढ़ – 180 दिन, किरोड़ीमल नगर पंचायत – 30 दिन
- प्रमाणपत्र की शर्त: नगर निगम – छत्तीसगढ़ शासन का प्रमाणपत्र, नगर पंचायत – भारत सरकार (अर्बन डेवलपमेंट) का प्रमाणपत्र
- अनुबंध अवधि: नगर निगम – 10 माह 4 दिन, नगर पंचायत – 1 वर्ष
- वार्षिक टर्नओवर: नगर निगम – ₹17 लाख, नगर पंचायत – ₹1.50 करोड़
- अनुभव की मांग: नगर निगम – 1 वर्ष, नगर पंचायत – 3 वर्ष



सबसे बड़ा सवाल: छोटा निकाय सख्त, बड़ा निकाय ढीला क्यों?
विशेषज्ञों और स्थानीय ठेकेदारों का कहना है कि सामान्यतः बड़े निकायों में पात्रता शर्तें अधिक कड़ी होती हैं, लेकिन यहां स्थिति उलट दिखाई दे रही है। किरोड़ीमल नगर पंचायत में जहां टर्नओवर और अनुभव की शर्तें कड़ी रखी गई हैं, वहीं रायगढ़ नगर निगम में अपेक्षाकृत ढील दी गई है।
इतना ही नहीं, नगर निगम के पिछले वर्ष (2025-26) के टेंडर में जहां 2 वर्ष का अनुभव मांगा गया था, वहीं इस बार इसे घटाकर 1 वर्ष कर दिया गया है और टर्नओवर भी केवल ₹17 लाख रखा गया है, जो कई सवाल खड़े करता है।
पक्षपात के आरोप, मिलीभगत की आशंका
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि नगर निगम रायगढ़ में टेंडर शर्तों को जानबूझकर आसान बनाया गया है, ताकि कुछ खास ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया जा सके। आरोप यह भी लग रहे हैं कि नियमों को नजरअंदाज कर अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत से यह खेल चल रहा है।
जांच की मांग तेज
मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों और ठेकेदारों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रखी गई, तो यह न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का भी मामला बन सकता है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है या फिर मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।


